Thursday, 31 October 2013

सरलता और सहजता ही जीवन में सफलता का मंत्र हैं। ये दोनों तत्व मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाते हैं क्योंकि सहज रहने से तनाव उत्पन्न नहीं होता और सरल रहने से अनावश्यक कामना। अनावश्यक कामना और तनाव ही दुर्भाग्य का कारण बनते हैं और सरलता और सहजता इन दोनों की तत्वों का पतन करते हैं। सरलता है न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीवन यापन। जीवन के कठिन मार्ग में ईश्वर का आशीर्वाद ही जीवन को सरल बनता है। सरलता का दूसरा नाम है सहजता। सहजता की प्राप्ति कठिन और जटिल परिस्थितियों से पार पाने का मार्ग प्रशस्त करती है।



उपलब्धियाँ अक्सर एकांगी होती है और इनसे प्राप्त अहंकार जीवन को एकरंगी बना देता है। जीवन तो भिन्न- भिन्न अनुभव लेने से समृद्ध होता है।
एक क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करके चादर तान के सो गये और मन में सोच लिया कि संसार फतेह कर लिया तो बहुत बड़ी भूल-भूलैया में फँस गये।
दौलत तुमने बहुत कमा ली या माता-पिता से मिल गयी और इसी कारण फूले-फूले रहने लगे तो तब तो तुम बहुत बड़े गरीब रह गये जीवन में। धन की अधिकता में तुमसे जीवन भर यह अहसास तो अनछुआ ही रह जायेगा कि अभाव क्या है?
बहुत बड़े पद पर पहुँच गये हो तो इस बात का अहंकार मत करना कि बस अब सारा जीवन तुम्हारी मुट्ठी में आ गया है, तुम अपने विभाग के सबसे छोटे पद पर काम करने वाले कर्मचारी के जीवन से एकदम अपरिचित हो। वह क्या सोचता है? उसकी क्या सीमायें हैं?
पाने का ही नाम जीवन नहीं है बल्कि अभाव भी एक जीवंत अनुभव है।
तुम बहुत बड़े कवि बन गये हो, पर जरा सोचो तो कि कितने अच्छे अच्छे गद्य लेखक दुनिया में तुम्हारे साथ ही विचरण कर रहे हैं और तुमने अभी तक श्रेष्ठ किस्म का गद्य रचने का आनंद नहीं लिया।
तुम तो सिर्फ अपने जैसा जीवन जानते हो। दिन के बहुत सारे घंटे व्यवसाय में ऊँचाई पाकर किसी बड़े पद पर आसीन होने की मह्त्वाकांक्षा का पीछा करने में खर्च हो जाते हैं तो ऐसी जीवनशैली से उत्पन्न व्यस्तता और अहंकार से तुम बहुत सारे अन्य तरह के भावों से अनभिज्ञ ही रह जाओगे।
अपने से अलग लोगों को, भले ही वे तुम्हारे सामने आर्थिक रुप से गरीब हों, उपलब्धियों में कमतर लगते हों, निम्न भाव से न देखना, किसी न किसी मामले में वे तुमसे ज्यादा उपलब्धि रखते होंगे।
केवल सफलतायें तुम्हे बहुत गहरे नहीं ले जा सकतीं। तुम्हे इसे भी जानना है कि असल में असफलता क्या है?
जब तक एक ही भाव के दोनों पूरक हिस्सों को नहीं जान लोगे तब तक दोनों ही से परे होने का अहसास नहीं जान पाओगे।
न पाने में अटकना है और न ही अभाव में। किसी भी एक भाव में अटक गये तो जीवन बेकार ही जाने के पूरे पूरे आसार बन जाते हैं। जीवन तो इन सब भावों से परे जाने के लिये है और इसके लिये एक भाव के दोनों परस्पर विपरित रुपों को जानना, पहचानना और जीना आवश्यक है।
किसी भी क्षेत्र में उपलब्धि पाना बहुत बड़ी योग्यता है और इसके लिये जीतोड़ प्रयास करो पर उपलब्धियों का अहंकार भूल कर भी न करो।
वास्तव में उपलब्धि जनित अहंकार का अकेला तत्व ही मनुष्य के जीवन को गरीब बना कर छोड़ देता है। इस अहंकार की उपस्थिति में आध्यात्मिक विकास असंभव है।
ये सब साधारण उपलब्धियाँ, जो तुम्हे बहुत बड़ी लगती हैं, और ये सारे अभाव जो तुम्हे बहुत बड़े लगते हैं, ये सारी बातें माध्यम हैं तुम्हे एक बड़े लक्ष्य की यात्रा से दूर रखने के। इन्ही सब बातों में अटक गये तो इन्ही के होकर रह गये।
जब जीवन में साधारण उपलब्धियों और अभावों से गुजर जाओगे तब तुम्हे आभास होगा उस अभाव का जिसे भरने के लिये की गयी यात्रा ही मनुष्य जीवन में सार्थकता ला पाती है।
बस साक्षी बने रहो, एक दिन वह प्यास जगेगी जरुर, एक दिन तुम उस परम यात्रा पर निकलोगे जरुर।
Story
एक बार एक त्यागी संत भिक्षा मांगते हुए एक सेठ के घर पहुचे , संत की सारगर्भित बाते सुनकर सेठ बड़ा प्रभावित
हुआ , तथा मन में कुछ पाने की लालसा रखकर उसने संत को प्रणाम किया , परन्तु संत उसके मन की बात समझ गए ,
अतः उन्होंने भी पलटकर सेठ को प्रणाम किया , तब सेठ ने आश्चर्य से पूछा - आपने मुझे क्यों प्रणाम किया ?
तब संत ने भी यही प्रश्न दोहराया , तो सेठ ने कहा की आप तो बड़े त्यागी है , आपने तो स्त्री , पुत्र , धन , जमीन-जायदाद
आदि सभी का त्याग कर दिया है , तब संत ने बड़े शांत चिर्त हो कर कहा- अच्छा तुम ही मुझे एक बात बताओ-
" भगवान् बड़ा है या रुपया-पैसा " ? तब सेठ ने कहा - माहात्मन नि-संदेह इन सबसे बड़े तो भगवान् ही है, तब संत ने कहा की इसीलिए तो
तुम बड़े त्यागी हुए , जो बड़ा त्याग करे वह बड़ा त्यागी , जो छोटा त्याग करे वह छोटा त्यागी , एव तुम तो बड़े त्यागी हो, क्योकि जिसने संसार के सुखो के लिए भगवान् तक का त्याग कर रखा है ,
यह सुनकर सेठ संत के चरणों में गिर पड़ा .............


एक गरीब माँ के छोटे बच्चे ने जब दुकान पर
आईसक्रीम देखी तो उसने अपनी माँ से कहा कि
मुझे ये दिलाओ ना
मगर
उसगरीब माँ के पास पैसे नी थे
तो वह खडी खडी रोने लगी और अपनी दर्द
भरी आवाज मे दुनिया को कुछ ये कहने लगी
मेरी गरीबी को देख जमाना मुस्कुराता है
तेरी शोहरत के आगे ये सर झुकाता है
तेरी गलती को भी ये सही करार देते है
मेरे सही होने पर भी ये मुझे मार देते है
तेरे सुख मे है सुखी और मेरे दुःख से अनजान है
क्यो है इतना फर्क जब हम दोनो एक समान है
मै भी तो इंसान हु और तु भी तो इंसान है
मै एक जोडी कपडे मे ही मर जाया करती हु
पेट भर खाना तो कभी कभी खाया करती हु
तुने कपडो का भडार लगा दिया
खाना तुने तो क्या तेरे कुतो ने भी खा लिया
कुते को करते हो प्यार और मेरा करते अपमान है
क्यो है इतना फर्क जब हम दोनो एक समान है
मै भी तो इंसान हु ओर तु भी तो इंसान है
सच मै अमीरी और गरीबी रुपी दिवार जब हमारे देश मे
से ढह जाएगे
उस दिन कोई भी माँ आसु नही बहाएगी.

No comments:

Post a Comment